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एक डरी हुई भाजपा

एक डरी हुई भाजपा

भाजपा इस समय बुरे दौर से गुज़र रही है. चेहरे से आत्मविश्वास गायब है और बातों में बौखलाहट साफ़ दिखाई दे रही है. भाजपा जिन मुद्दों पर कांग्रेस को सत्ता से हटाकर काबिज हुई थी, अब वही सब करती नज़र आ रही है. हालांकि उस समय भी भाजपा सैद्धांतिक रूप से भले खुद को पाक साफ़ दिखा रही थी, लेकिन व्यव्हार में दूर दूर तक कोई नैतिकता नहीं थी. हालाँकि भाजपा कुछ कोशिशें ज़रुर करती है, जैसे एक ये कि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में आत्मविश्वास से लबरेज है, जिसे कामयाबी मिली भी थी. और दूसरी ये कि भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा लड़ाई लड़ रही है, ऐसा स्थापित करने की कोशिश भी उन तमाम कोशिशों में से है.

लेकिन जो भाजपा अगले 3 कार्यकाल सत्ता में रहने के दावे कर रही थी, वो तीन साल के भीतर ही कमज़ोर दिखाई देने लगी है. भाजपा का जादू उतरने लगा है और साथ ही मोदी जी के चेहरे का रंग भी. राजनीति में 2014 के बाद से अब तक का सफर सबसे अधिक उथल पुथल भरा रहा और इससे अधिक अनैतिक दौर कभी देखने को ही नहीं मिला. खरीद फरोख्त से लेकर धर्म, सेना, देश साबके नाम पर राजनीति चालू है. पहले पहल तो बात करते हैं कि कैसे भाजपा कमज़ोर दिखाई दे रही है-

अन्य पार्टियों से निष्कासित या दलबदलू नेताओं और भ्रष्टाचार के आरोपियों को पार्टी में भर्ती:

मुकुल रॉय:

तृणमूल से निष्कासित बड़े नेता मुकुल रॉय ने दो दिन पहले भाजपा ज्वाइन कर ली. ये वही मुकुल रॉय हैं जो ममता बैनर्जी के सबसे नजदीकी माने जाते थे. बेशक बंगाल में सत्ता पक्ष के साथ सालों से जुड़े होने के कारण मुकुल रॉय बंगाल की राजनीती में पैनी धार रखते हैं. आज रॉय भाजपा के नेता हैं और ऐसा करने से उनके सभी पाप गंगा में डुबकी लगाकर पवित्र हो गए हैं. लेकिन यही मुकुल रॉय तृणमूल कांग्रेस में थे, तब इनके ऊपर लगा था शारदा चिटफंड घोटाले का आरोप. उस समय पूरी भाजपा के लिए मुकुल रॉय सबसे भ्रष्ट नेता थे और इनके खिलाफ विधानसभा चुनाव में जमकर प्रचार हुआ था. हर विपक्षी की तरह केंद्र की सीबीआई हाथ धोकर रॉय के पीछे पड़ गई थी और आये दिन मुकुल रॉय सीबीआई दफ्तर में हाजिरी लगाते दिखते. लेकिन आज भाजपा की भर्ती के बाद मुकुल रॉय देश के सबसे ईमानदार नेता बन गए हैं. हालाँकि थोड़ी शर्म के चलते उनका भगवाकरण खुद अमित शाह ने नहीं किया, बल्कि कैलाश विजयवर्गीय और रविशंकर प्रसाद ने उन्हें शपथ दिलाई. इससे पहले कि आप भूल जाएं, मैं आपको याद दिला दूँ कि कलकत्ता के प्रदेश भाजपा नेता प्रताप बैनर्जी ने कहा था कि भाजपा में सब नदी नाले आकर पवित्र हो जाते हैं.

हिमंता बिस्वा:

असम में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले हिमंता बिस्वा को भी भाजपा में लाकर शुद्धिकरण किया गया था. कांग्रेस में मंत्री पद के दौरान हिमंता पर जल प्रबंधन ठेके में गड़बड़ी के आरोप लगे थे. बिस्वा पर 4 करोड़ की रिश्वत का भी आरोप लगा था. केंद्र की सीबीआई एजेंसी बिस्वा पर लगे आरोपों की जाँच कर रही थी, लेकिन भाजपा में आकर इस जाँच का क्या हाल है ये सब समझ सकते हैं.

सुखराम:

दूरसंचार घोटाले मामले में आरोपी रहे सुखराम को भी हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने चुनाव से पहले पार्टी में शामिल कर लिया. भाजपा के नेता सुधांशु त्रिवेदी ने सुखराम का बचाव करते हुए कहा था कि दूरसंचार घोटाला बहुत ही पुराना घोटाला है. सुधांशु त्रिवेदी के तर्क पर अमल किया जाये तो फिर तो भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो ही जायेगा, या शायद अब तक हो भी गया हो. खैर, भाजपा देश को उस तरह से तो भ्रष्टाचार मुक्त नहीं कर पाई, लेकिन इस तरह के कुतर्कों से वो भ्रष्टाचार समूल ख़त्म कर देगी.

नारायण राणे:

भाजपा ने कांग्रेस के रत्न नारायण राणे को पार्टी में शामिल कर लिया. नारायण राणे पर भाजपा ने एक वक़्त पर जमकर आरोप लगाये थे. आज राणे भाजपा की गंगा में धुल चुके हैं.

येदुरप्पा:

येदुरप्पा तो भ्रष्टाचार के प्रपितामह रह चुके हैं. जो मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में ही पद से हटाया गया था, उसी को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाली पार्टी वापिस ले आई है. न सिर्फ उन्हें कर्णाटक में प्रमुख चेहरा बनाया गया है बल्कि मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया गया है.

मौविन गोडिनो और पांडुरंग मडकईकर:

एक वक़्त पर कांग्रेस में रहे मौविन गोडिनो और पांडुरंग मडकईकर के खिलाफ भाजपा ने भ्रष्टाचार का खुलासा किया था. मनोहर पारिकर ने नब्बे के दशक में गोडिनो के खिलाफ पॉवर घोटाले का खुलासा किया था. पांडुरंग मडकईकर पर 2014 में भूमि अधिग्रहण घोटाले में आरोप पारिकर ने ही लगाये थे. अब सब शुद्ध हैं।

फ़िलहाल, ये तो बस कुछ एक उदाहरण हैं, भाजपा के मुकुट में ऐसे नगीनों की लम्बी फ़ेहरिस्त है.

हेलिकॉप्टर से उड़ कर अन्य राज्यों से मोदी के गुजरात जा रहे हैं स्टार प्रचारक योगी:

योगी आदिनाथ के यूपी से उड़कर जगह जगह राज्यों में ले जाया जा रहा है. आश्चर्य की बात है कि मोदी ने जिस राज्य के विकास का डंका बजाकर सत्ता हासिल की थी, उसी गुजरात में यूपी के मुख्यमंत्री को ले जाकर वोट मांगे जा रहे हैं. अमित शाह के बेटे जय शाह की कम्पनी पर एक साल में 16000 गुना मुनाफा कमाने के आरोप में भाजपा चौतरफा घिर गई. 50,000 रुपए से बढ़कर 80 करोड़ सालाना मुनाफा जाने लगा. इस मामले का असर भाजपा की छवि पर नकारात्मक पड़ा ये सब मान रहें हैं.

लगातार दलितों पर होने वाले हमलों ने भाजपा की गुजरात में छवि को नुक्सान पहुँचाया. 19 वर्षीय प्रकाश सोलंकी की गरबा में भाग लेने के लिए की गई हत्या हो, गांधीनगर के लिबोंदरा गाँव में मूछ रखने के लिए हुई 17 साल और 24 साल के दो युवकों की ह्त्या हो, भाजपा की छवि इससे दलित विरोधी बनी. इस छवि ने राज्य में भाजपा विरोधी दलित आन्दोलन चला दिया. पाटीदार आन्दोलन तो लंबे समय से गुजरात में भाजपा के गले की फांस बना ही हुआ है.

अहमद पटेल की जीत ने भी भाजपा की जमकर किरकिरी की थी. भाजपा ने इस चुनाव को जीतने में ऐड़ी चोटी की ताकत लगा दी थी, लेकिन अहमद पटेल का अनुभव काम आ गया. वैसे गुजरात कांग्रेस का सत्यनाश भी पटेल साहब ने कम नहीं किया है। नोटबंदी और जीएसटी के द्वारा भाजपा ने व्यापारियों के पेट पर जमकर लात मारी. देश भर के व्यापारियों का गुस्सा झेल रही भाजपा, गुजरात में इनके गुस्से से खासी डरी हुई है.

मोदी पर नहीं, येदुरप्पा-योगी पर भरोसा कर रही है भाजपा:

सबसे आश्चर्य की बात है कि मोदी के नाम पर चाँद तक जाने का आत्मविश्वास रखने वाली भयमिश्रित भाजपा मोदी के नाम पर कहीं चुनाव लड़ना नहीं चाहती. कार्नाटक में येदुरप्पा और गुजरात में योगी आदित्यनाथ पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भरोसा दिखा रहा है. इन सब क़दमों में भाजपा का डर स्पष्ट दिख रहा है. जिसका फायदा बेशक अन्य पार्टियों को मिलेगा. बहरहाल, यह तो तय हो चुका कि अब 2019, 2014 से काफ़ी अलग होगा।


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