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दहलीज़ पर दिल – एक उपन्यास

दहलीज़ पर दिल – एक उपन्यास

किताब की दहलीज़

ये किताब किसी भी एक इंसान, एक दर्द, एक संघर्ष, एक विरोध, एक आंदोलन की कहानी नहीं है. इसका मकसद हफ्ते भर चले किसी धरना प्रदर्शन या किसी गुस्से को जाहिर करना नहीं है. इसमें किरदार के रूप में देश की सर्वोच्च सत्ता पर बैठे महामहिम भी है और एक मोहल्ले की गली में चाय की दुकान पर ग्लास धोता 8 साल का बच्चा भी.

इसका मकसद बड़ा है. इसका मकसद आप की नजरों को देश की उस हिस्से की तरफ मोड़ना है, जो कहने को तो केंद्र में है, पर जैसे केंद्र में होने की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, वो कोई नहीं जानता. दिल्ली: देश की राजधानी! आप बदकिस्मती कहें या इसका नसीब कि पिछले 3 साल में जितने आरोप जितने कलंक, जितनी कालिख इसके चेहरे और चरित्र पर पुती, किसी और को उतनी जिल्लत झेलनी नहीं पड़ी.

इसका कसूर बस इतना रहा कि इसने अपनी गोद में ऐसी औलादों को आसरा दिया, जिनके लिए देश, इस धरती, इसका मान सम्मान, इसकी प्रतिष्ठा की कीमत कौड़ी भर भी नहीं.

एक लंबा सफ़र, जो खेल खेल में शुरू हुआ, जिसके मोहरे, जिसकी प्यादे, खुद में अपना कोई वजूद नहीं रखते थे, वो कैसे अभिमानी राजा को अर्श से फर्श पर ले आए, यह देखना वाकई दिलचस्प है.


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