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प्रधान सेवक जी! आखिर हमारा क़सूर क्या है?

पेट्रोल-डीजल में आग लगी है। ये आग केंद्र में बैठी सरकार की लगाई हुई है और इसमें जल रहा है आम आदमी का सुख चैन। लेकिन जनता के इस दुख से मोदी सरकार की बाछें खिली हुई हैं। इस खुशी में मोदी सरकार के नवरत्न नेताओं के मुख से ऐसे ऐसे बोल फूट रहे हैं कि क्या कहें! मोदी जी के पर्यटन मंत्री के.जे. अल्फ़ोंस का कहना है कि पेट्रोल खरीदने वाले भूखे नहीं मर रहे, सरकार ने सोच समझकर टैक्स लगाया है। यानी आपने अपने खून पसीने की कमाई से यदि स्कूटर भी खरीद लिया तो इस सरकार..

गहने खुले में नहीं रखते हम, क्योंकि वो कीमती हैं, फिर बच्चे क्यों?

रेयान इंटरनेशनल स्कूल में जो सब हुआ, उसे सुनकर मेरे अंदर वही उथल पुथल हुई जो हर एक पिता में मन में हुई होगी। मैंने अपने दोनो बच्चों को गौर से देखा और उनकी चिंता में मानो घुल सा गया। प्रद्युम्न के माता पिता किस हाल में होंगे, कल्पना करना भी मुश्किल है। आखिर कैसा समाज बना दिया है हमने? किस तरह के समाज में रह रहे हैं हम लोग। बच्चे के माथे पर सहलाकर जब हम उन्हें सुबह स्कूल के लिए जगाते हैं, तो क्या सोचते हैं? मैं सोचता हूँ कि घर के सुरक्षा कवच से निकालकर मैं..

देश क़तार में है

देश कतार में है. इस देश का किसान कतार में है. पूर्व सैनिक OROP की कतार में हैं. नजीब की माँ नजीब को पाने के लिए कतार में हैं, बंसल परिवार की आत्महत्या या (हत्या) के लिए परिवार की आत्मा कतार में हैं, रोहित वेमुला की माँ भी न्याय की उम्मीद में क़तार में हैं और पूरा देश, पिछले एक हफ्ते से मौत का तांडव देखते हुए पैसे पाने के लिए बैंक की क़तार में है. देश कतार में है. इस देश का किसान कतार में है. इस देश का मजदूर कतार में है. बड़े बूढ़े कतार में है. महिलाए..

नरेंद्र मोदी के नाम- एक खुला पत्र

आपकी एक बात जिससे कोई इनकार नही कर सकता वो यह है कि आप जहाँ-जहाँ गए, उस-उस जगह से अपने पूर्व जन्म या पूर्व जीवन का कोई पुराना नाता जोड़ लिया या फिर जिस-जिस वोट बैंक को भुनाना चाहा, तो उनके इतिहास में घुसकर जबरन उनके संघर्षरत नेता या उद्वारक को अपना आदर्श बना लिया. महात्मा गांधी हो या शहीद भगत सिंघ, बल्लभ भाई पटेल हो या अब बाबा साहेब अम्बेडकर, आपको जब जिसका नाम, जिसकी छवि अपने चुनावी प्रचार में आवश्यक प्रतीत हुई, आपने उनके नाम, उनके संघर्ष, उनकी मान्यताओं के जमकर गुण गाए. लेकिन ऐसा करते हुए..

अपने राजनैतिक हितों के आगे, जनता के हितों का बलिदान मत दीजिए, प्रधानमंत्री सर!

अखिल विश्व में संभवतः सबसे ज्यादा राजनैतिक रैलियां (जो अब भी जारी हैं) करने का रिकॉर्ड बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अब शायद सबसे ज्यादा जुमलेबाजी का भी रिकॉर्ड बना चुके हैं। लेकिन नीयत के फ़र्क को समझने वाली जनता का आशीर्वाद ही था कि लोकसभा में चमत्कारी आंकड़ा छूने वाली बीजेपी दिल्ली में अपनी पूरी अजेय सेना को लेकर उतरने के बाद भी 4 कोने नही घेर पायी। अब इसका बदला वो कुछ इस तरह ले रहे हैं, कि जो अनाप-शनाप बन पड़ रहा है दिल्ली सरकार को रोकने के लिए वो करने में गुरेज़ नहीं कर रहे और..

दहलीज़ पर दिल – एक उपन्यास

किताब की दहलीज़ ये किताब किसी भी एक इंसान, एक दर्द, एक संघर्ष, एक विरोध, एक आंदोलन की कहानी नहीं है. इसका मकसद हफ्ते भर चले किसी धरना प्रदर्शन या किसी गुस्से को जाहिर करना नहीं है. इसमें किरदार के रूप में देश की सर्वोच्च सत्ता पर बैठे महामहिम भी है और एक मोहल्ले की गली में चाय की दुकान पर ग्लास धोता 8 साल का बच्चा भी. इसका मकसद बड़ा है. इसका मकसद आप की नजरों को देश की उस हिस्से की तरफ मोड़ना है, जो कहने को तो केंद्र में है, पर जैसे केंद्र में होने की..

दिलीप पांडे : देश के दर्द को बयां करती है दादरी की घटना

ये हिचक मेरे, आपके, और शायद हम सबके अन्दर होगी कि 29 सितम्बर की रात हुई दादरी की घटना को कैसे बोला, सुना और लिखा जाये। क्या इसे ऐसे कहा जाए कि एक गांव के आदमी को उसी गांव के लोगों ने मार डाला? या ऐसे लिखें कि एक निर्दोष को कुछ दोषियों ने मार डाला? पर असल सच हम सबको डराता है, क्योंकि जितना असहनशील और असहिष्णु हमारा समाज इस वक़्त हो चुका है हम ये कहने में भी डरने लगे हैं कि असल मुद्दा क्या है। वाकई ये मुद्दा हिन्दू मुसलमान का नहीं है। एक धर्म से..

खुलती गिरहें

खुलती गिरहें उपन्यास में पांच अलग-अलग स्त्री किरदार है जो अपनी धुन में दुनिया के सामने अपने होने के एहसास को मजबूत कराती हुई दिखाई देती हैं. उनकी जिंदगी की उधेड़बुन, उनकी जद्दोजहद, उनके अस्तित्व का संकरे पिंजरों की कैद से छूटकर बाहर निकलना और अपना आसमान तथा अपनी दिशा तय करना – सबकुछ उपन्यास में बहुत बारीकी से उभरता है. हर जीवन प्रशांत एक औरत में बहुत कुछ तोड़ता भी है, जोड़ता भी है...

झटका अरविन्द केजरीवाल को, लोकतान्त्रिक मूल्यों को या दिल्ली की जनता को ?

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र के मामले में जैसे ही हाई कोर्ट का फैसला आया, मीडिया में चारों तरफ अचानक एक खबर पसर गयी. केजरीवाल सरकार को झटका, दिल्ली सरकार को झटका, हाई कोर्ट से झटका, अराजक मुख्यमंत्री को झटका. इस फैसले के आने से हमे रत्ती भर भी हैरानी नही हुई. अगर ये आशानुसार नही होता, तो आम आदमी पार्टी पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करती. माननीय हाईकोर्ट के इस फैसले से अपनी विनम्र असहमति जताते हुए, लोकतंत्र के रखवालों से हम कुछ सवाल भी पूछना चाहते हैं कि किसानो की ज़मीन..

मंगेसर के मड़ई

मंगेसर के मड़ई मुसटोली के पार रहे, जहां ऊ आपन मेहरारू, 2 लईकी, अ ए गो लईका संगे रहत रहे। मंगेसरा दूसरा के खेत में मजूरी कर के, अउर मरल जानवर उठा के रोजी रोटी कमात रहे। 36 साल के मंगेसर के सरकारी पिलानिंग में ए गो मड़ई भर जगह गाँव के एक दम बहरे मिलल, त खुसी के मारे मंगेसरा के भावे न मिले। मंगेसर के मन बनल कि ई दूसरकी मड़ई लइकवा फत्ते के दीया जाए, बियाह के बाद। फत्ते अबही नौ बरिस के हौउवेे, एक आध साल में बियाह करे क बिचार बनाके मंगेसरा मगन रहे...

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