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देश क़तार में है

देश कतार में है. इस देश का किसान कतार में है. पूर्व सैनिक OROP की कतार में हैं. नजीब की माँ नजीब को पाने के लिए कतार में हैं, बंसल परिवार की आत्महत्या या (हत्या) के लिए परिवार की आत्मा कतार में हैं, रोहित वेमुला की माँ भी न्याय की उम्मीद में क़तार में हैं और पूरा देश, पिछले एक हफ्ते से मौत का तांडव देखते हुए पैसे पाने के लिए बैंक की क़तार में है. देश कतार में है. इस देश का किसान कतार में है. इस देश का मजदूर कतार में है. बड़े बूढ़े कतार में है. महिलाए..

नरेंद्र मोदी के नाम- एक खुला पत्र

आपकी एक बात जिससे कोई इनकार नही कर सकता वो यह है कि आप जहाँ-जहाँ गए, उस-उस जगह से अपने पूर्व जन्म या पूर्व जीवन का कोई पुराना नाता जोड़ लिया या फिर जिस-जिस वोट बैंक को भुनाना चाहा, तो उनके इतिहास में घुसकर जबरन उनके संघर्षरत नेता या उद्वारक को अपना आदर्श बना लिया. महात्मा गांधी हो या शहीद भगत सिंघ, बल्लभ भाई पटेल हो या अब बाबा साहेब अम्बेडकर, आपको जब जिसका नाम, जिसकी छवि अपने चुनावी प्रचार में आवश्यक प्रतीत हुई, आपने उनके नाम, उनके संघर्ष, उनकी मान्यताओं के जमकर गुण गाए. लेकिन ऐसा करते हुए..

अपने राजनैतिक हितों के आगे, जनता के हितों का बलिदान मत दीजिए, प्रधानमंत्री सर!

अखिल विश्व में संभवतः सबसे ज्यादा राजनैतिक रैलियां (जो अब भी जारी हैं) करने का रिकॉर्ड बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अब शायद सबसे ज्यादा जुमलेबाजी का भी रिकॉर्ड बना चुके हैं। लेकिन नीयत के फ़र्क को समझने वाली जनता का आशीर्वाद ही था कि लोकसभा में चमत्कारी आंकड़ा छूने वाली बीजेपी दिल्ली में अपनी पूरी अजेय सेना को लेकर उतरने के बाद भी 4 कोने नही घेर पायी। अब इसका बदला वो कुछ इस तरह ले रहे हैं, कि जो अनाप-शनाप बन पड़ रहा है दिल्ली सरकार को रोकने के लिए वो करने में गुरेज़ नहीं कर रहे और..

दहलीज़ पर दिल – एक उपन्यास

किताब की दहलीज़ ये किताब किसी भी एक इंसान, एक दर्द, एक संघर्ष, एक विरोध, एक आंदोलन की कहानी नहीं है. इसका मकसद हफ्ते भर चले किसी धरना प्रदर्शन या किसी गुस्से को जाहिर करना नहीं है. इसमें किरदार के रूप में देश की सर्वोच्च सत्ता पर बैठे महामहिम भी है और एक मोहल्ले की गली में चाय की दुकान पर ग्लास धोता 8 साल का बच्चा भी. इसका मकसद बड़ा है. इसका मकसद आप की नजरों को देश की उस हिस्से की तरफ मोड़ना है, जो कहने को तो केंद्र में है, पर जैसे केंद्र में होने की..

दिलीप पांडे : देश के दर्द को बयां करती है दादरी की घटना

ये हिचक मेरे, आपके, और शायद हम सबके अन्दर होगी कि 29 सितम्बर की रात हुई दादरी की घटना को कैसे बोला, सुना और लिखा जाये। क्या इसे ऐसे कहा जाए कि एक गांव के आदमी को उसी गांव के लोगों ने मार डाला? या ऐसे लिखें कि एक निर्दोष को कुछ दोषियों ने मार डाला? पर असल सच हम सबको डराता है, क्योंकि जितना असहनशील और असहिष्णु हमारा समाज इस वक़्त हो चुका है हम ये कहने में भी डरने लगे हैं कि असल मुद्दा क्या है। वाकई ये मुद्दा हिन्दू मुसलमान का नहीं है। एक धर्म से..

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