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खुलती गिरहें

खुलती गिरहें उपन्यास में पांच अलग-अलग स्त्री किरदार है जो अपनी धुन में दुनिया के सामने अपने होने के एहसास को मजबूत कराती हुई दिखाई देती हैं. उनकी जिंदगी की उधेड़बुन, उनकी जद्दोजहद, उनके अस्तित्व का संकरे पिंजरों की कैद से छूटकर बाहर निकलना और अपना आसमान तथा अपनी दिशा तय करना – सबकुछ उपन्यास में बहुत बारीकी से उभरता है. हर जीवन प्रशांत एक औरत में बहुत कुछ तोड़ता भी है, जोड़ता भी है...

झटका अरविन्द केजरीवाल को, लोकतान्त्रिक मूल्यों को या दिल्ली की जनता को ?

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र के मामले में जैसे ही हाई कोर्ट का फैसला आया, मीडिया में चारों तरफ अचानक एक खबर पसर गयी. केजरीवाल सरकार को झटका, दिल्ली सरकार को झटका, हाई कोर्ट से झटका, अराजक मुख्यमंत्री को झटका. इस फैसले के आने से हमे रत्ती भर भी हैरानी नही हुई. अगर ये आशानुसार नही होता, तो आम आदमी पार्टी पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं करती. माननीय हाईकोर्ट के इस फैसले से अपनी विनम्र असहमति जताते हुए, लोकतंत्र के रखवालों से हम कुछ सवाल भी पूछना चाहते हैं कि किसानो की ज़मीन..

मंगेसर के मड़ई

मंगेसर के मड़ई मुसटोली के पार रहे, जहां ऊ आपन मेहरारू, 2 लईकी, अ ए गो लईका संगे रहत रहे। मंगेसरा दूसरा के खेत में मजूरी कर के, अउर मरल जानवर उठा के रोजी रोटी कमात रहे। 36 साल के मंगेसर के सरकारी पिलानिंग में ए गो मड़ई भर जगह गाँव के एक दम बहरे मिलल, त खुसी के मारे मंगेसरा के भावे न मिले। मंगेसर के मन बनल कि ई दूसरकी मड़ई लइकवा फत्ते के दीया जाए, बियाह के बाद। फत्ते अबही नौ बरिस के हौउवेे, एक आध साल में बियाह करे क बिचार बनाके मंगेसरा मगन रहे...

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