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मंगेसर के मड़ई

मंगेसर के मड़ई

मंगेसर के मड़ई मुसटोली के पार रहे, जहां ऊ आपन मेहरारू, 2 लईकी, अ ए गो लईका संगे रहत रहे। मंगेसरा दूसरा के खेत में मजूरी कर के, अउर मरल जानवर उठा के रोजी रोटी कमात रहे। 36 साल के मंगेसर के सरकारी पिलानिंग में ए गो मड़ई भर जगह गाँव के एक दम बहरे मिलल, त खुसी के मारे मंगेसरा के भावे न मिले। मंगेसर के मन बनल कि ई दूसरकी मड़ई लइकवा फत्ते के दीया जाए, बियाह के बाद। फत्ते अबही नौ बरिस के हौउवेे, एक आध साल में बियाह करे क बिचार बनाके मंगेसरा मगन रहे.

लेकिन आज के जमाना में गरीब के सपनो देखे के अधिकार कहाँ बाटे। मंगेसरा के घरे पड़ाइन अम्मा के बनिहार सबेरे सबेरे चिचियाये लागल। बनिहार पंडित बाबा के संदेसा लेके आइल रहे। मंगेसरा सरपट बाबा के चौखटे पर पहुँच के, भुइँया गोड़ मोड़ के कुक्कुर नियर बईठ गईल। अउर कउनो तरीका ओके अइबे न करे बोड़ मालिकार लोगन के सामने बइठे क।

मालिकार कहलन: करे, तोर करेजा बड़ा बड़ियार हो गइल बा, सुनली हं? मंगेसर के बुझईबे न करे की बाबा का कहल चाहत हउवन। दांत चियार के बस एतने कह पईलस कि मालिक आपके बहरे थोड़े न हई जा। हमहन की जिनगी आपे के असरे ह, मालिकार! ई सुनके बाबा कपारे पर के चुन्नी ऐंठ के कहल कि तोर नइकी मड़इया हमरे खेत के कोना पर ह, खेत के चौहद्दी बिगड़त बा ओसे, ओके हटा ले ऊंहा से। ओकरा बदले एक मन चाउर अ पुरनकी मड़ई के ठीक करावे के पईसा हमसे ले ले।

मंगेसरा सन्न रह गईल। मालिकार के खेत क खूबसूरती बनावे में ओकर आपन सपना पर खूँटा न ठोका जाये ई सोच सोच के खोपड़ी में बवंडर उठे लागल । भगवान के बनावल छेद रहे देह में, कुल बंद हो गइल। थूक गटक के बस एतने कह पइलस कि बाबा तनी मलकिनिया से पूछ लेइ, फिर हम आपके काल्ह बताईब। बस, एतना पर त बाबा के पारा गरम। माई, बहिन, बेटी कुल गरिया के रख देहल। दुआरे से बगेदत के कहल कि अगर सांझ ले ना उठल मड़ई त तोहार मेहरारू बेटी उठ जाइ।

बड़की बेटी पढ़ल लिखल रहे, कहलस, बाबू जी, जमाना बदल गईल ह, पुलिस के रिपोट लिख देवे के चाही, हम दारोगा जी के नाम चिठ्ठी लिख देब, दे आवा। मंगेसर के आपन सपना बचावे बदे एक बार हिम्मत बटोरे क मन कईलस। तुरंते चिट्ठी लिखवा के दरोगा जी के दे आइलन। राती के मंगेसर आराम से सुत्तल। एक दम भोरे अन्हारे मड़ई के बाहर जोर क हल्ला गुल्ला सुनके नींद खुलल, जनाए कि मछरी बाजार खुल गईल। केवाड़ी के बाहर से अंजोर, मड़ई में धुंआ धुआं लगल त मंगेसरा कुल माजरा समझ में आइल। सबके जगा के बहरे भेजलस, लईकी क बियाह बदे जोड़ल समान कपड़ा लत्ता, मेहरारू के चानी अउरी इस्टील के गहना कुल जर गईल। छाती पीट पीट मंगेसरा के मेहरारू लईकी के बेहोसी छाये लगल। तब्बे केहू कहलस कि मंगेसरा रे, तोर दुसरकी मड़इयो केहू फूक देहलस। एक दम भोरे भोरे मंगेसरा के जिनगी के सूरज डूबला नियर लागे लगल, ऊ समझ गईल कि ई कुल केकरे वजह से भईल ह। मंगेसर भागल भागल दरोगा जी के घरे पहुचल, ऊंहा मंगेसर अउरी ओकर मेहरारू जाके रोवे लगल गोड़ धर के दरोगा जी। दरोगा जी मेहरारू के झुक के उठा लिहलन। ओकरे सीना पर नजर पसार के कहलन, का भईल, मड़ई जर गईल का? मंगेसरा के माथा घूम गईल, लेकिन बात समझ में आ गईल कि दरोगा जी के कइसे कुल बात पहीले से पता ह। दरोगा जी कहलन, रात के आवा, कुछ काम ह, तोहार मेहरारू कर सकेले। ओकरा बाद हम तोहार मुआवजा के बात काल्ह करब बड़का साहब से। मंगेसर कहलस, मालिक आज न्याय मिल जाये त बड़ा एहसान होइ आपके। पईसा रूपया के लालच ना ह। दारोगा जी दतुअन रगड़त कहलन, आज कुछ न होई, आज पनरह अगस्त ह बे! जवन मिलत ह, रख ले, स्साला जिद्द करबे, त मेहरारू बेटी कुल जीयान हो जाइ। मंगेसर, दारोगा के दुआरी आपन सपना के दफ़न कर, आपन परिवार ले दरोगा जी के बखरी से निकल गईल। कान में गाना के बोल पड़ल- अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं!


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